PADMAAVAT MOVIE REVIEW

TIMES OF INDIA

Critic's Rating: 4.0/5
PADMAAVAT WINS ITS TRIAL BY FIRE
PADMAAVAT STORY: Rani Padmavati (Deepika Padukone) - the wife of Maharawal Ratan Singh (Shahid Kapoor), is known for her beauty and valour in 13th century India. She captures the fancy of the reigning Sultan of Delhi, the tyrant Alauddin Khilji (Ranveer Singh), who becomes obsessed with her and goes to great lengths to fulfill his greed.
PADMAAVAT REVIEW: Based on a Sufi poem of the same name written in 1540 by Malik Muhammad Jayasi, Sanjay Leela Bhansali has added his own flair and interpretation to 'Padmaavat', giving it a fairy-tale sheen. This makes all the controversy pointless, and pale in comparison to the spectacle that unfolds. Bhansali reunites with two of his favourite leads in recent times - Deepika Padukone and Ranveer Singh, but adds Shahid Kapoor to complete this trio of commendable acting talent.
Shahid is steadfast and unflappable as Maharawal Ratan Singh - the ruler of Mewar, brimming with Rajput pride. He brings a regal aura to the character that warrants him winning the confidence and loyalty of the Mewar kingdom and more importantly, Rani Padmavati's heart. Deepika is radiant as the Rajput Queen whose beauty, brains and valour moves the entire plot along once Alauddin Khilji becomes obsessed with her. Padmavati's allure beyond the superficial is prominent post-interval, when her character comes to life and she gets to showcase her acting range. Ranveer as Alauddin Khilji is seen as an unhinged, barbaric Sultan, who is consumed with a ravenous libido for power and flesh. He unleashes an animal magnetism on screen with a scarred face, kohl-lined eyes and a greased torso. The scenes between him and Shahid are some of the most engrossing, as both flex their acting muscles at opposite ends of the moral spectrum. Besides them, Aditi Rao Hydari stands her ground as the naive Mehrunissa who gets a rude awakening when she discovers her husband Alauddin's true nature. Jim Sarbh is somewhat misplaced as the Sultan's slave-general, unable to generate enough menace to overshadow his master's own. Nonetheless, the ensemble moves well in tune with Bhansali's vision of this larger-than-life retelling.
The director's expertise in heightening opulence and grandeur is well-known, further distinguishable in 3D. Cinematographer Sudeep Chatterjee compliments him by beautifully capturing some jaw-dropping scenery. However, the effects in the action/ war scenes don't meet the expectations raised by a film of this scale. Also, the songs don't do much to further the narrative other than providing visual delight. Granted, it could do with a tauter screenplay and shorter run-time but 'Padmaavat' is an entertaining, large canvas experience, brought to life with Sanjay Leela Bhansali's stroke of visual brilliance.


NAVBHART TIMES

Critic's Rating: 4.5/5सारा मसला ख्वाहिशों का है... फिल्म की शुरुआत में खिलजी का यह डायलॉग पूरी फिल्म का सार है। दुनिया की हर नायाब चीज पर अपना कब्जा करने की चाहत रखने वाला अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती की एक झलक देखने की ख्वाहिश कर तड़प कर रह जाता है। पूरी फिल्म खिलजी की सनक, उसके झक्कीपन, उसकी इच्छाओं, उसकी मर्जी, उसकी सेक्शुएलिटी, उसके जुनून को लेकर है। 
चित्तौड़ के राजपूत राजा उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं और खिलजी धोखे से राज्य हड़पने में कामयाब तो हो जाता है, लेकिन अपनी सूझबूझ, कूटनीति और प्रेजेंस ऑफ माइंड के जरिए किस तरह रानी पद्मावती सनकी खिलजी की उस एक ख्वाहिश को अधूरा रख छोड़ती हैं, यही संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म 'पद्मावत' में बड़े शानदार ढंग से दिखाया है। आंखों को चकाचौंध कर देने वाली भंसाली की इस पीरियड फिल्म में एक से एक शानदार परफॉर्मेंसेज हैं। सिनेमा हॉल से बाहर आकर दो चीजें आपके दिमाग पर दस्तक देंगी, एक तो खिलजी के रूप में रणवीर सिंह का दमदार अंदाज अौर दूसरा यह कि आखिर इस फिल्म पर इतना विवाद हो क्यों रहा है, जबकि फिल्म में तो वैसा कुछ भी नहीं है।
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फिल्म की कहानी मलिक मोहम्मद जायसी की 1540 में लिखी पद्मावत पर आधारित है, जो राजपूत महारानी रानी पद्मावती के शौर्य और वीरता की गाथा कहती है। पद्मावती मेवाड़ के राजा रावल रतन सिंह की पत्नी हैं और बेहद खूबसूरत होने के अलावा बुद्धिमान, साहसी और बहुत अच्छी धनुर्धर भी हैं। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी पद्मावती की इन्हीं खूबियों के चलते उनसे इस कदर प्रभावित होता है कि चित्तौड़ के किले पर हमला बोल देता है। फिल्म के अंत में महाराज रावल रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी के बीच तलवारबाजी के सीन में रतन सिंह अपने उसूलों, आदर्शों और युद्ध के नियमों का पालन करते हुए खिलजी को निहत्था कर देते हैं, लेकिन पद्मावती को पाने की चाहत में खिलजी धोखे से रतन सिंह को यह कहकर मार डालता है कि जंग का एक ही उसूल होता है, जीत। अपनी आन-बान-शान की खातिर इसके बाद पद्मावती किस तरह जौहर के लिए निकलती हुए खिलजी की ख्वाहिशों को ध्वस्त कर देती हैं यही फिल्म की कहानी है। चित्तौड़ के मशहूर सूरमा गोरा और बादल की शहादत को भी फिल्म में पूरे सम्मान के साथ दर्शाया गया है।
करीब 200 करोड़ की लागत से बनी 'पद्मावत' अब तक की सबसे महंगी फिल्म बताई जाती है। फिल्म के हर सीन में सिर से पांव तक ढकीं दीपिका पादुकोण ने अपने चेहरे के हाव भाव और खासतौर से आंखों के जरिए जो दमदार अभिनय किया है, वह सराहनीय है। चाहे प्यार हो या गुस्सा, हर तरह का इमोशन तुरंत दीपिका की बड़ी-बड़ी आंखों से साफ महसूस किया जा सकता है। 30-30 किलों के खूबसूरत लहंगों, भारी गहनों और खासतौर पर नाक की नथ में दीपिका खूब जमी हैं। सजी-धजी दीपिका की मौजूदगी को पूरे स्क्रीन पर इस कदर दिखाया गया है कि आसपास सब कुछ बौना नजर आता है। 
शाहिद कपूर ने महाराजा रावल रतन सिंह के किरदार के साथ न्याय किया है। वह शुरू से अंत तक शालीन नजर आए लेकिन एक किरदार जो पूरी फिल्म को अपने कब्जे में करता है वह हैं अलाउद्दीन खिलजी यानी रणवीर सिंह। रणवीर असल जिंदगी में भी जिस कदर एनर्जी से भरपूर हैं। शुरू से अंत तक एक सनकी, विलासी, व्यभिचारी और कुंठित मानसिकता जैसे लक्षणों को जीवंत करने में रणवीर ने जान लड़ा दी है। खली वली गाने में उनका हैपी डांस, उनकी एनर्जी को समेटने में कामयाब हुआ है। उनके कई डायलॉग्स आपको सिनेमा हॉल से बाहर निकलते हुए याद रह जाएंगे। मसलन खिलजी की क्रूरता दिखाता एक डायलॉग- सीन में उनकी पत्नी उनसे कहती हैं कुछ तो खौफ खाइए। इस पर वह पलटकर पूछते हैं आज खाने में क्या-क्या है? जब उन्हें बताया जाता है कि खाने में ढेर सारे पकवान हैं तो खिलजी का जवाब होता है, जब खाने में इतना कुछ है तो खौफ क्यों खाऊं? साथ ही फिल्म में उनके अंदर छिपे एक नाकाम प्रेमी की बेबसी को दर्शाता एक डायलॉग- वह अपने गुलाम मलिक काफूर से लगभग रोते हुए पूछते हैं, काफूर बता मेरे हाथ में कोई प्यार की लकीर है, नहीं है तो क्या तू ऐसी लकीर बना सकता है? काफूर अपने मालिक की ऐसी हालत देख रोता है। 61688009
गुलाम मलिक काफूर के रोल में जिम सरभ के रूप में एक सरप्राइज दिया है भंसाली ने इंडस्ट्री को। अपने शानदार हावभाव के जरिए ही काफूर यह साबित करने में कामयाब होते हैं कि वह मन ही मन खिलजी से प्यार करते थे। जलालुद्दीन खिलजी के रोल में रजा मुराद ने बेहद दमदार रोल किया है तो अदिति राव हैदरी भी खिलजी की बीवी के रोल में बेहद सशक्त लगी हैं। भंसाली के कैमरे ने उनकी खूबसूरती को भी बेहद उम्दा ढंग से उभारा है। घूमर गाना तो पहले ही काफी हिट हो चुका है, इसके अलावा भी तुर्क-अफगानी संगीत का अच्छा संगम इस फिल्म में है। फिल्म की एडिटिंग इतनी उम्दा है, स्क्रिप्ट इतनी टाइट है कि दो घंटे 44 मिनट यूं निकल जाते हैं। 3डी फिल्म के पैमाने पर पद्मावत एकदम खरी उतरती है। शुरुआत में फैंटसी, रोमांस और राजस्थानी पारंपरिक लोक-संगीत से सराबोर कहानी कब अचानक आपको अपने ड्रामे में बांध लेती है आपको पता ही नहीं चलता। कुल मिलाकर फिल्म बहुत खूबसूरत लगेगी, आपकी आंखों को, आपके जेहन को और आपके दिल को। मुमकिन है कि इसे देखने के बाद इसका विरोध करने वाले लोग अपनी विचारधारा बदलकर इस फिल्म पर गर्व का अहसास करने लगें।


MUMBAI MIRROR

Critic's Rating: 3.5/5In a battle scene, we find a fierce conqueror holding his horse while his troops charge ahead. As he stares fixedly at the cloud of dust rising from the point of collision, we wonder if his leading-from-behind war strategy has a nuance that doesn't meet the eye. Just then, with a grimace and a cry, he bolts ahead, holding a spear in jabbing position and disappears in the curtain of dust. Soon, he emerges on the other side with a human head stuck at the end of his weapon — as if he had forked up what he wanted from a buffet.
This determined unforgiving warrior happens to be Alauddin Khilji, ruler of the Delhi Sultanate. While the previous depiction of Khilji — Om Puri in Shyam Benegal's Bharat Ek Khoj, had a more aristocratic flair, Ranveer Singh's fluid reimagining of the totalitarian warrior delves into his manic mind to extract his animalistic instinct and snatch all that impresses him. A man of multiple layers, Singh's Khilji is a bag of contradictions — temperamental yet decisive — from cackling about with his uncle Jalaluddin to getting him stabbed in the back. While the brutality seems like a fleeting act of rage, it is later confirmed as a premeditated political move.


MAHARASHTRA TIMES

Critic's Rating: 3.5/5अभिजित थिटे
लसलसत्या लालसेसमोर आत्मसन्मान, सज्जनपणा, सभ्यता ठामपणे उभी राहते, तेव्हा आग भडकतेच. हा जोहार असतो त्या मानी जगण्याचा आणि त्यामध्ये खाक होणार असते ती लालसा, विकृती आणि वखवखलेपण. 'पद्मावत' या चित्रपटात महाराणी पद्मावती ठाम पावले टाकत धडधडत्या ज्वाळा जवळ करू लागते, तेव्हा त्यांची धग समोरच्या प्रेक्षकालाही लागते. राणीला जिंकण्यासाठी जिवाचे रान करत किल्ल्यातून धावणाऱ्या अल्लाउद्दीन खिलजीची तोपर्यंत विकृत असलेली नजर बिथरते, तेव्हा त्याच्या त्या अहंकाराला लागलेला मोठा धक्का प्रेक्षकांनाही जाणवतो. 'पद्मावत' चित्रपटाचा सुन्न करणारा शेवट हेच त्याचे यश आहे.
महाराणी पद्मावती (दीपिका पदुकोण), महारावळ रतन सिंह (शाहीद कपूर) आणि अल्लाउद्दीन खिलजी (रणवीरसिंह) या व्यक्तिरेखा, तसेच या चित्रपटाची कथा यांविषयी वेगळे सांगण्याची तशी गरज नाही. या ऐतिहासिक व्यक्तिरेखा, त्यांच्याविषयी असलेल्या आख्यायिका, लोकमानसात वर्षानुवर्षे प्रचलित असलेल्या गोष्टी, त्यांच्यावर लिहिली गेलेली काव्य यांच्यापलीकडे जात हा चित्रपट काहीतरी दाखवू पाहतो; तेव्हा ही कलाकृती चित्रपटाच्या चौकटीपुरती मर्यादित राहत नाही. माणसांतील अदीम असलेल्या भावनांची ती होऊन जाते. विपरीत परिस्थितीतही आपला सभ्यपणा, मर्यादा न सोडणारा महारावळ रतनसिंह पाहता पाहता खूप उंच दिसू लागतो. अत्यंत हुशार, सुंदर, पतीवर निरतिशय प्रेम करणारी, प्रसंगी पोलादाप्रमाणे कणखर होणारी महाराणी पद्मावती त्याच्या खांद्याला खांदा लावून उभी राहते, तेव्हा तो क्षण शक्तीच्या जागराचा होतो. चित्रपटातील इतर पात्ररचना, महाल, तळी, राजदरबार यांचे सेट, पोषाख हे सारे भव्य आणि चांगले. अल्लाउद्दीनची पत्नी मेहरुन्नीसाची (आदिती राव हैदरी) कुचंबणा, तिचे आतल्या आत कुढणे, पित्याचा वध पतीनेच केल्याचे समजल्यानंतर दबलेला हुंदका आणि शेवटी सत्याच्या बाजूने उभे राहणे, यातून तिची भूमिकाही उंचावते. सुलतनाचा गुलाम त्याच्याच इच्छांचा हुंकार आहे.
चित्रपटाची मांडणी करताना सुलतानाचे वागणे, जे हवे ते मिळविण्याची त्याची तीव्र इच्छा सुरुवातीला दिसते. त्यानंतर महाराणी पद्मावती आणि रतन सिंह भेटतात. त्यांच्यातील प्रेमकथा उमलते. चित्तोड गड दिसतो. एका घटनेमुळे राजगुरूला देशाबाहेर काढले जाते. तो बदला घेण्यासाठी सुलतानाला जाऊन भेटतो आणि त्याच्या मनामध्ये पद्मावती विषयी लालसा जागवतो. या प्रवासात अल्लाउद्दीनने दिल्लीचे तख्त मिळविणे, जे आवडेल ते बळाने मिळविणे हे येते. रणवीर सिंह याने ही लालसा त्याच्या डोळ्यांतून, देहबोलीतून दाखवली आहे. त्याला असलेली हाव छोट्या छोट्या गोष्टीतून दिसते. अगदी तो जेवतानाही ती भूक जाणवत राहते. याउलट पद्मावती आणि रतन सिंह दिसतात. पद्मावतीची मध्यवर्ती भूमिका दीपिका ताकदीने साकार करण्याचा प्रयत्न करते. फक्त काही वेळा कृत्रिम वाटून जाते. रतन सिंह आणि अल्लाउद्दीन एकमेकांसमोर उभे राहतात, त्या दोघांची भेट होते, दर्पणात पद्मावतीचे प्रतिबिंब दिसते, ही दृश्ये जमली आहेत. शाहीद उंचीने कमी असला, तरी त्या त्या प्रसंगी तो उंच वाटू लागतो. रणवीरचे डोळे छान बोलले आहेत. हे सारे चित्रण करणारा कॅमेरा उत्तम. संगीत चांगले आहे; परंतु पार्श्वसंगीत अधिक उजवे. सर्वांत शेवटच्या टप्प्यावरचे पार्श्वसंगीत अंगावर काटा उभा करते.
चित्रपटाचा शेवट अधिक उंच. मधील काही प्रसंग संपेनासे होतात. प्रत्येक चित्रपट दोनच तासांत संपायला हवा असे नाही. कथेचा पट मांडण्यासाठी योग्य तो वेळ घ्यायलाच हवा; परंतु ते जाणवायलाही हवे. मध्यंतरापूर्वी हा वेग उणावतो. महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे युद्धाचे प्रसंग असूनही प्रचंड हिंसा दिसत नाही. जे काही घडते ते मानसिक पातळीवरचे आहे. याकडे एक प्रतीक म्हणूनही पाहता येईल. महारावळ रतन सिंह, सुलतान अल्लाउद्दीन खिलजी आणि महाराणी पद्मावती हा एक विचार आहे. बांधीव पटकथा, संवाद आणि अभिनयातून हा विचार आपल्यापर्यंत पोहोचतो.

source: indiatimes.com

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